सरकार द्वारा किए गए किसी भी परिवर्तन पर केवल श्रमिक वर्ग के लोग ही क्यों पीड़ित होते हैं.?

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"सरकार"

सुनो ये सड़क पर जाते मजदूरों के पैर के छाले दिखे क्या किसी अखबार के पन्ने या टीवी चैनल पर ? वो टेंट वो सामियाना दिखा क्या कहीं जो लगाया जाता है चुनावी सभाओं में ? वो अधिकारी या वो नेता दिखे क्या कहीं जो पैर धोते हैं राहगीरों की हर उत्सव पर ?

ये सब अभी नहीं दिखेंगे क्योंकि सबको पता है कि यह आपदा है और ऐसे में मजदूरों के साथ ही कष्ट होगा, ये मजदूर तो टैक्स या फंड देते नहीं हैं तो इनके लिए कैसी ममता ? सबको पता है कि जैसे ही चुनाव आएगा सरकार इतने मजबूर हैं कि बेच देंगे महज 500 रुपयों और एक साड़ी में अपने वोट।
कारण यह नहीं है कि सरकार ऐसे हैं अपितु कारण यह है कि वर्षों से एक शिशु को एक घड़े में ही रखा गया है जिससे उसके अंग ना विकसित हो पाए हैं ना ही वह अब इस घड़े की बाहर की दुनिया में खड़ा हो सकता है।

यूपीएससी का परिणाम

हर वर्ष यूपीएससी की परीक्षा का परिणाम जब आता है तो एक राज्य का नाम सबसे शीर्ष पर रहता है, हर पांच वर्ष पर जब लोकसभा चुनावों के परिणाम आते हैं| देश की विधायिका को जब नया रूप प्रदान किया जाता है| उस समय एक राज्य निर्णायक भूमिका निभाता है। इस स्वतंत्र देश के प्रथम नागरिक के रूप में उसी राज्य के एक नागरिक ने शपथ लिया था और भारतवर्ष के इतिहास में अब तक सबसे विस्तृत मगध साम्राज्य भी इसी राज्य सरकार की देन है लेकिन फिर भी ऐसी क्या बात है |

जो आज किसी भी आपदा में बिहारी शीर्ष से सड़क पर आ जाते हैं ?चमकी बुखार की मार हो, कोरोना का प्रभाव हो, महाराष्ट्र इत्यादि से उत्तर भारतीयों को भगाए जाना हो या दिल्ली में किसी होटल में सांस्कृतिक दृष्टि से किसी को तिरस्कृत किया जाना, हर जगह एक बिहारी को ही अपमानित होना पड़ा है, कष्ट उठाना पड़ा है, सड़कों पर आना पड़ा है। आज काम की तलाश में बिहार छोड़ विभिन्न राज्यों में आये जो लोग अपने ही देश में प्रवासी के नाम से जाने जा रहे हैं इन्हीं की बदौलत इस राष्ट्र की हर इमारत की नींव में ईंट पड़ी है, इन्हीं के कारण आज तकनीक में विकास की गति इतनी तीव्र है और इन्हीं के कारण शहर गतिमान भी हुआ है। शहर के सबसे बड़े उद्योग का सफाई कर्मचारी और सुरक्षा प्रहरी हो या उसको संचालित करने वाला प्रबंधक, उसकी अपनी माटी बिहार ही है।

वह अपनी माटी बस दो रोटियों के लिए छोड़ कर आया है और आज सड़क पर वह एक लाश में बदल गया है। वह माँ जो अपने बच्चे को पीठ पर बांध कर बिना पांव में जूतों के साथ इस सड़क पर पैदल धूप में चल रही है उसका कुसूर मात्र इतना ही है कि उसने इन शहरों में इन गाड़ियों को चलते रहने देने के लिए अपना गांव छोड़ा था।

वह अपने पेशे से ड्राइवर पति को शाम की थकावट के बाद रोटी देने के लिए शहर आई थी। आज वह लाचार है, बेबस है, मजबूर है और सड़कों पर असहाय पड़ी है। सोशल मीडिया पर ऐसी ना जाने कितनी माँ, बाप और बच्चों के फोटो आंसुओं के साथ एक मोबाइल वाले भैया से दूसरे मोबाइल वाले भैया के पास जा रहे हैं।लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या इस लाचारी की कीमत सिर्फ सोशल मीडिया पर वायरल होने तक और इन लाशों पर नेताओं की झूठी आंसुओं के साथ ट्विटर पर संवेदना और सहानुभूति तक ही है ?

"सरकार"

खबर कुछ पुरानी नहीं है महज दो तीन दिन पहले की ही है। उत्तर प्रदेश के औरेया जिले में अपने घर वापस लौट रहे 24 मजदूर सड़क पर कुचलने से मर गए तो वहीं दूसरी ओर वो दृश्य भी सबके आंखों के सामने अब भी वैसे ही है जब सुखी रोटियों की गठरी लिए अपने घर वापस लौट रहे मजदूर ट्रेन की चपेट में आकर लाश के लोथड़े में तब्दील हो गए थे। इन सब पर हम आंसू बहाते हैं लेकिन जब भी समय हमारे पास आता है हमारे ये आंसू सुख जाते हैं और हम पुनः एक ऐसी मृग तृष्णा में चले जाते हैं जहां सरकार के झूठे वादों का वह मायावी पैसा इन दुःखों के ऊपर एक मायाजाल बना लेता है। फिर हम फंस जाते हैं इसी जाल में।

बिहार सरकार ने एक से बढ़कर एक होनहार छात्र दिए जिन्होंने इतिहास रचा, सबसे अच्छे विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाने वाला बिहार आज इस स्थिति में है कि वहां के बच्चों के पास शिक्षा का कोई साधन नहीं है जिस लिए वो कोटा जाते हैं, दिल्ली जाते हैं , बैंगलोर जाते हैं। आज उनके पास नौकरी नहीं है जिस कारण उन्हें दर दर हाथ में रिज्यूम का पन्ना और प्रमाण पत्रों की फ़ाइल लिए इस आफिस से उस आफिस तक भटकना पड़ता है।

सशक्त बिहार

उनके पास उद्योग नहीं है इस लिए सब कुछ का आयात करना पड़ता है और स्वास्थ्य की सुविधा नहीं है जिस कारण उन्हें ताने सुनने पड़ते हैं। आखिर राजनीतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, कार्मिक रूप से सशक्त बिहार के साथ ये कौन सा चक्र प्रारम्भ हुआ, ऐसा कौन सा स्वांग रचा गया जो आज यह बिहार हर क्षेत्र में पिछड़ा है। एक विकलांग व्यक्ति जैसे कार्य करने की इच्छा शक्ति के बाद भी सड़क पर रेंगते हुए चलता है और लोगों द्वारा उपेक्षित नज़रों से देखा जाता है आज बिहार को इसी स्थिति में लाकर छोड़ दिया गया है।

यह प्रश्न चिंता का नहीं अपितु चिंतन का है। कुछ लेख, कुछ पोस्ट और कुछ वीडियो बना देने से इसका निदान नहीं निकल सकता इसलिए हमें स्वयं से प्रयास करना होगा। एक छोटी कोशिश हम भी कर रहे हैं इस चुनौती से निपटने हेतु, समस्याएं बहुत हैं लेकिन हम समाधान हेतु प्रयासरत हैं। अगर आप यह लेख पढ़ते पढ़ते अपने किसी ऐसे व्यक्ति की सोच में पड़ गए हैं जो बिहार से है और उसे अभी आवश्यकता है किसी प्रकार के मदद की तो हमसे 9871329928 पर संपर्क करें। साथ ही हमें कोई सुझाव देने हेतु या किसी समस्या से अवगत कराने हेतु आप [email protected] पर मेल भी कर सकते हैं।
धन्यवाद।

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